1.
तूफ़ान में है कश्ती, और दूर किनारे हैं !
यादें हैं तेरी, बाक़ी हम जिनके सहारे हैं !
तुम जब से गये हमदम , ऐसा हमें लगता है
हम जीत के भी सब कुछ , इस मोड़ पे हारे हैं !!
2.
जिंदगानी के शब्-ओ-रोज़ , किये हैं भारी !
हाथ में आई हुई थी जो, वो बाज़ी हारी !!
हम सा नादान ज़माने में भला होगा कोई ?
हमने खुद अपने ही पाँव पे कुल्हाड़ी मारी !!
3.
हमने कोशिश हज़ार की लेकिन ,
दिल को आया नहीं सुकूँ अब तक !
दिल सुकूँ पायेगा ये जब की बात
हश्र दिल का मैं क्या करूँ तब तक ??
4.
हमने एक बुत को, मोहब्बत में, खुदा समझा था !
और फिर उसकी जफ़ाओं को, वफ़ा समझा था !!
और फिर उसकी जफ़ाओं को, वफ़ा समझा था !!
चार दिन खेल के, एक रोज़ इसे तोड़ गया ;
दिल-ए-मासूम को, उस शख्स ने क्या समझा था ??
5.
वफ़ा की आग न लग पाई जब लगाने से !
तो फिर बुझेगी भला किस तरह बुझाने से ?
मोहब्बतें हुआ करती हैं ज़िन्दा -ओ -जावेद (immortal)
न मिट सकेगी मोहब्बत कभी मिटाने से !!
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---Jawaid ''Saahir''
Comments
hmmm..okk...
keep writingg......
i vl keep followingg......:-p
U have really exalted me :)
[Actually some of these lines were written leisurely.... Here, I posted them as fillers.... in between...:)]