Skip to main content

Posts

Showing posts from June, 2012

वो जो गीत तुमने सुना नहीं

वो जो गीत तुमने सुना नहीं मेरी उम्र भर का रियाज़ था ! मेरे दर्द कि थी वो दास्ताँ जिसे तुम हँसी में उड़ा गए ! मेरी उम्र से न सिमट सके मेरे दिल में इतने सवाल थे ! तेरे पास जितने जवाब थे तेरी एक निगाह में आ गए ! -- Anonymous  

कोई बात नहीं

यही वफ़ा का सिला है, तो कोई बात नहीं ! ये दर्द तुमने दिया है, तो कोई बात नहीं! भला मजाल है किसकी , कहे दीवाना मुझे? मगर ये तुमने कहा है, तो कोई बात नहीं! यही बहुत है के, तुम देखते हो साहिल   (shore/bank) से, सफ़ीना   (boat) डूब रहा है , तो कोई बात नहीं!!!! -- Anonymous

हम - ज़बां कोई न हो

रहिये  अब  ऐसी  जगह  चल  कर  जहाँ  कोई  न  हो हम - सुख़न   कोई  न  हो  और   हम - ज़बां   कोई  न  हो. (I shall go now and live at a place where no one lives Where there is  no one to talk to ,  to speak your tongue  none.)  बे दर - ओ - दीवार   सा  इक  घर  बनाया  चाहिए कोई   हमसाया   न  हो  और   पासबाँ   कोई  न  हो   (A house with  no doors, no walls  should be built There shan't be any  neighbour ,  to watch over  no one)  पड़िये    गर  बीमार  तो  कोई  न  हो   तीमारदार   और  अगर  मर  जाइए  तो   नौहा -ख्वाँ   कोई  न  हो  (If you fall sick, no one shall  look after you  And if you die, to cry there shan't be anyone)  --...

दिल में सूरत तुम्हारी बसती है

तुमसे आबाद दिल की बस्ती है इसमें सूरत तुम्हारी बसती है खो के इन में हुआ मैं मस्ताना तेरी आँखों में कैसी मस्ती है पेश-क़दमी  ( coming  forward ) फ़क़त मेरी ही नहीं  कुछ तुम्हारी  भी पेश-दस्ती  (approaching) है  मानता हूँ तुम्हें खुदा अपना क्या पता क्या वफ़ा परस्ती है जब कभी तेरी याद आती है आँख मेरी बहुत बरसती है मुझसे कर के मज़ाक क़िस्मत भी आज हालत पे मेरी हंसती है  अब ख़ुदा ही लगाये इस को पार  फिर भंवर में वफ़ा की कश्ती है ! ---- Jawaid 'Saahir'

दिल की बस्ती (The Heart's Abode)

दिल की बस्ती   एक   ऐसी बस्ती (habitation)  है ! जो बहुत मुश्किलों से बसती   है  (gets inhabited) !! दुनिया खो जाये तो बहुत महंगी, और अगर मिल गयी तो सस्ती है! वक़्त के हाथों की है कठपुतली (puppet), और क्या आदमी की हस्ती   (worth)   है ? पूजता कौन है खुदा को अब ? अब तो हर सिम्त   (everywhere)  खुद-परस्ती   (self-worship) है !! पस्तियों  में भी एक ऊँचाई  हर बुलंदी में कोई  पस्ती   ( lowliness )  है ! कोई आसूदा-हाल (well-off) क्या जाने ? तंग-हाली  (impoverishment) में कैसी मस्ती  (ecstasy)  है ! --- Jawaid 'Saahir'

Meandering Couplets

1. तूफ़ान में है कश्ती, और दूर किनारे हैं ! यादें हैं तेरी, बाक़ी हम जिनके सहारे हैं ! तुम जब से गये हमदम , ऐसा हमें लगता है हम जीत के भी सब कुछ , इस मोड़ पे हारे हैं !! 2. जिंदगानी के शब्-ओ-रोज़ , किये हैं भारी ! हाथ में आई हुई थी जो, वो बाज़ी हारी !! हम सा नादान ज़माने में भला होगा कोई ? हमने खुद अपने ही पाँव पे कुल्हाड़ी मारी !!   3. हमने कोशिश हज़ार की लेकिन , दिल को आया नहीं सुकूँ अब तक ! दिल सुकूँ पायेगा ये जब की बात हश्र दिल का मैं क्या करूँ तब तक ??            4. हमने एक बुत को, मोहब्बत में, खुदा समझा था !   और फिर उसकी जफ़ाओं को, वफ़ा समझा था !! चार दिन खेल के, एक रोज़ इसे तोड़ गया ; दिल-ए-मासूम को, उस शख्स ने क्या समझा था ??  5. वफ़ा की आग न लग पाई जब लगाने से ! तो फिर बुझेगी भला किस तरह बुझाने से ? मोहब्बतें हुआ करती हैं ज़िन्दा -ओ -जावेद (immortal)  न मिट सकेगी मोहब्ब...

Some Couplets Are Only For the Beloved

[Jan Nisar Akhtar  ( February 14, 1914 – August 19, 1976 ) was an important 20th century Indian Urdu poet and lyricist of Bollywood. He was born in 1914, in  Gwalior ,  into a family of Sunni theologians, scholars and poets. Jaan Nisar did his B. A. Honours and M. A. from Aligarh Muslim University and  taught Urdu  at   Victoria College, Gwalior and  Hamidia College, Bhopal . He then moved to Mumbai for writing lyrics of Hindi cinema. (The present day famous Bollywood lyricist Javed Akhtar is one of his two sons.)  His poetry was secular and like many of progressive writers of his generation talked of freedom, dignity, economic exploitation and other issues gleaming of the leftist leanings. He was a member of the Progressive Writers' Association. He received the 1976 Sahitya Akademi Award  in Urdu by  Sahitya Akademi  for his poetry collection ----  "Khaak-e-dil"...
अब ख़ुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला   हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला  हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा  जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला उसको रुख्सत किया था तो ये मालूम न था सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला  दूर के चाँद को ढूंढों न किसी के आँचल में  ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला इक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया कोई जल्दी में, कोई देर से जाने वाला निदा फ़ाज़ली POSTED BY  ASHISH   AT  11:03 PM   4 COMMENTS   SUNDAY, NOVEMBER 28, 2010 कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है  जिन बातों को खुद न समझे औरों को समझाया है  हमसे पूछो इज्ज़त वालों की इज्ज़त का हाल कभी  हमने भी इस शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों  आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है  कोई मिला तो हाथ मिला...