अब ख़ुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला
हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा
जिस तरफ देखिये आने को है आने वाला
उसको रुख्सत किया था तो ये मालूम न था
सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला
दूर के चाँद को ढूंढों न किसी के आँचल में
ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला
इक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया
कोई जल्दी में, कोई देर से जाने वाला
निदा फ़ाज़ली
SUNDAY, NOVEMBER 28, 2010
कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को खुद न समझे औरों को समझाया है
हमसे पूछो इज्ज़त वालों की इज्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है
उससे बिछड़े बरसों बीते लेकिन आज न जाने क्यों
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारण धमकाया है
कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बातें की
घर से बहार जब भी निकले दिन भर बोझ उठाया है
निदा फ़ाज़ली
MONDAY, APRIL 5, 2010
अपना ग़म लेकर कहीं और न जाया जाये
अपना ग़म लेकर कहीं और न जाया जाये
घर में बिख़री हुई चीज़ों को सजाया जाये
जिन चिराग़ों को हवाओं का कोई खौफ़ नहीं
उन चिराग़ों को हवाओं से बचाया जाये
बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाये
[ आदाब = सलीका ]
खुदखुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में
और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाये
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये
निदा फ़ाज़ली


Comments