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Showing posts from August, 2012

ईद के दिन ग़मी सी लगती है !

(Remembering you Grandma on this Eid.........Missing you badly!!) फ़िज़ा ज़माने की कुछ मातमी   (melancholic)  सी लगती है ! हर एक शै   (thing)  में किसी की कमी सी लगती है ! मैं उनकी दीद   (seeing)  को तरसूँ ,  तो ईद काहे की ? मुझे   तो   ईद के दिन भी ग़मी सी लगती है ! मैं ग़म छुपाने को हर वक़्त मुस्कुराता हूँ मेरी निगाहों में फिर भी नमी सी लगती है ! ख़ुदा ही जाने मेरी ज़िन्दगी में कब हो सेहर (dawn) के मुझको हिज्र   (separation)  की हर शब्    थमी सी लगती है ! न हो जुदाई, तो फिर लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या?  जुदाई इश्क़ में कुछ लाज़मी सी लगती है !! जो तिश्ना - लब (parched-lip) ही रहा जू - ए - आब   (near to water)  भी ' साहिर ' मेरी मिसाल उसी आदमी सी लगती है !! --- जावेद ' साहिर '