तुमसे आबाद दिल की बस्ती है
इसमें सूरत तुम्हारी बसती है
खो के इन में हुआ मैं मस्ताना
तेरी आँखों में कैसी मस्ती है
पेश-क़दमी (coming forward ) फ़क़त मेरी ही नहीं
कुछ तुम्हारी भी पेश-दस्ती (approaching) है
मानता हूँ तुम्हें खुदा अपना
क्या पता क्या वफ़ा परस्ती है
जब कभी तेरी याद आती है
आँख मेरी बहुत बरसती है
मुझसे कर के मज़ाक क़िस्मत भी
आज हालत पे मेरी हंसती है
अब ख़ुदा ही लगाये इस को पार
फिर भंवर में वफ़ा की कश्ती है !
---- Jawaid 'Saahir'
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