[Here is a complete version of another famous Ghazal by Qateel Shifai ! Jagjeet Singh has given it his beautiful voice! It is also one of my all time favourites......]
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको !
मैं हूँ तेरा, तू नसीब अपना बना ले मुझको !
कल की बात और है, मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको !
मैं हूँ तेरा, तू नसीब अपना बना ले मुझको !
मैं हूँ गर काँटा, तो चल मुझ से बचा कर दामन
मैं हूँ गर फूल, तो जूड़े में सजा ले मुझको !
मैं 'खुले दर के किसी घर' का हूँ सामाँ (goods) प्यारे,
तू दबे पाँव कभी आके चुरा ले मुझको !!
मैं 'समन्दर' भी हूँ, 'मोती' भी हूँ, 'ग़ोता-ज़न' (one who dives deep) भी;
कोई भी नाम मेरा लेके बुला ले मुझको !
तू ने देखा नहीं, आईने से आगे कुछ भी
ख़ुद-परस्ती (Self-worship/praise) में कहीं तू न गँवा ले मुझको !
तर्क-ए-उल्फ़त (abstaining from love) की क़सम भी कोई होती है क़सम ?
तू कभी याद तो कर, भूलने वाले मुझको !!
मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने ?
ये तेरी सादा-दिली (plain heartedness) मार ना डाले मुझको।
कल की बात और है, मैं अब सा रहूँ या न रहूँ
जितना जी चाहे तेरा, आज सता ले मुझको!
खुद को मैं बाँट न डालूं कहीं दामन- दामन
कर दिया तूने अगर, मेरे हवाले मुझको !
बादह ( Wine) फिर बादह है, मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’
शर्त ये है कोई बाहोँ में सम्भाले मुझको!!!
-- क़तील शिफाई
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