मेरी कविताएँ पगली हैं
ये हैं बिल्कुल सपनीली सी!
इन में जो बातें हैं न जी
ये सब हैं 'ख़ाली-पीली' सी!!
माना ये दुनिया ज़ालिम है,
और इसकी हवा ज़हरीली सी !!
हैं लोग बड़े ही सर्द-मुहर,
बातें उनकी बर्फ़ीली सी !!
पर दुःख के आँसू, काहे को?
आँखें मत रक्खो गीली सी!
जो होना है सो होएगा
आँखें रक्खो सपनीली सी!!
ऐसी ही काली काली सी
ऐसी ही गहरी, नशीली सी!!
आँखें मत रक्खो गीली सी!
जो होना है सो होएगा
आँखें रक्खो सपनीली सी!!
ऐसी ही काली काली सी
ऐसी ही गहरी, नशीली सी!!
-- जावेद ''साहिर''
Comments
ThoRi si raat aur hai subah to hone do,
Aadhe adhoore khwaab jo poore naa ho sake,
Ek baar phir se neend mein woh khwaab bone do..." :)
--Gulzar