(Remembering you Grandma on this Eid.........Missing you badly!!)
फ़िज़ा ज़माने की कुछ मातमी (melancholic) सी लगती है !
हर एक शै (thing) में किसी की कमी सी लगती है !
मैं उनकी दीद (seeing) को तरसूँ, तो ईद काहे की ?
मुझे तो ईद के दिन भी ग़मी सी लगती है !
मैं ग़म छुपाने को हर वक़्त मुस्कुराता हूँ
मेरी निगाहों में फिर भी नमी सी लगती है !
ख़ुदा ही जाने मेरी ज़िन्दगी में कब हो सेहर (dawn)
के मुझको हिज्र (separation) की हर शब् थमी सी लगती है !
न हो जुदाई, तो फिर लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या?
न हो जुदाई, तो फिर लज्ज़त-ए-मोहब्बत क्या?
जुदाई इश्क़ में कुछ लाज़मी सी लगती है !!
जो तिश्ना-लब (parched-lip) ही रहा जू-ए-आब (near to water) भी 'साहिर'
मेरी मिसाल उसी आदमी सी लगती है !!
--- जावेद 'साहिर'
Comments
jab jara gardan jhukai dekh li.
eid aankh ki nahi dil ki hoti hai bhai
pahle isque kar phir samjhega